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Monday, 23 September 2019

नारी (एक अनबुझ पहेली)


नारी एक ऐसा शब्द, एक ऐसा स्वरुप जिसके बारे में कुछ भी लिखना या कहना बहुत ही कठिन है। अनादिकाल से नारीशक्ति की कई गाथायें प्रचलित रही है। धर्मग्रन्थों में नारी को शक्तिस्वरूपा बताकर उसे गौरान्वित करते आये हैं, लेकिन उसी जगह उसे भोग और विलास की प्रतिमूर्ति बनाकर प्रताड़ित और अनादरित भी करते आये हैं।

        समाज चाहे कोई भी हो, काल चाहे कोई भी हो, युग चाहे कोई भी हो, उसकी रूप रेखा लोगों ने अपनी-अपनी इच्छाओं और समझ के अनुसार ही बनाई है। जैसे नारी का कोई अस्तित्व ही नहीं हो। ये कैसा समाज है और ये कैसी सोच है, जिससे कभी कोई ऊपर उठ ही नहीं रहा।  आज भी एक नारी को सहमी, बेचारी और असहाय ही समझा जाता है। जो नारी अति संघर्षों के बाद आगे बढती है, अपनी हिम्मत और साहस से हर मुश्किलों का सामना कर अपनी एक नई पहचान बनाती है, उसे दुनिया के सामने तो सम्मान मिलता है पर कहीं न कहीं उसकी झोली में आंसुओं का समंदर भी होता है। ये जीवन का अनुभव है या यूँ कह लीजिए एक नारी का नारी को समझने की कोशिश ।

      बचपन से ही संघर्षों का दौर शुरू हो जाता है कभी बेटी के रूप में, कभी बहन के रूप में। हर पल अपनी इच्छाओं को पहले तवज्जो न देकर दूसरों की खुशियों को ध्यान में रखकर चलना ही सीखने लग जाता है बचपन। बचपन कब युवावस्था में तब्दील हो जाता है पता भी नहीं चलता। हर छोटी-छोटी खुशियों के साथ समझौता करते-करते अपनी खुशी समझने, उसे महसूस करने की तमन्ना ही खो जाती है। यहीं से उसे कमजोर बनाने की जड़ें मजबूत होने लगती है। जो जितना ज्यादा अपनी खुशियों का त्याग करती है, उसे और ज्यादा सहना और त्याग करना पड़ता है। पर उसकी कोई इज्जत नहीं, उसके त्याग की कोई कीमत नहीं, लोग ये भूल जाते हैं कि उसने अपनी खुशियों का त्याग उन सबको ही खुश रखने के लिए किया है जो आज उसके त्याग पर हँसते हैं, उसे पागल, बेवकूफ समझते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि जो आज उनके होठों पर हंसी और उनके जीवन में खुशी है उसके उसी त्याग की वजह से है, प्रायः ये एहसास मृत्यु से पहले होता है, अगर ये एहसास जीवनकाल में हो जाए तो हर परिवार सुखी और समृद्ध हो जाए।

       नारी के बिना घर, घर नहीं, परिवार नहीं, समाज नहीं, देश नहीं फिर, ये कैसी अनबुझ पहेली है जो सुलझती नहीं। नारी को एक नारी ही समझ सकती है। ये मेरी सोच है, मुझसे शायद कुछ लोग सहमत होंगे कुछ नहीं लेकिन मेरा अनुभव ये कहता है कि नारी को समझना लोग इसलिए कहते हैं कि बहुत कठिन है, क्योंकि नारी एक नारी को समझना ही नहीं चाहती है। नारी ही नारी की दुश्मन बनकर परिवार, समाज, देश को खोखला करती जा रही है। पुरुष तो दोषी बाद में है, लेकिन मैं जहाँ तक सोचती हूँ तो, मुझे यही लगता है की, नारी तो शक्ति है उसे कई जिम्मेदारियों से परिपूर्ण इस धरती पर अवतरित किया गया है। जो जितनी जल्दी अपनी जिम्मेदारियों को समझ लेती है उसकी जिन्दगी उतनी ही ज्यदा सफल हो जाती है। नारी की जिन्दगी रिश्तों की बेड़ियों से शुरू होती है और वहीं खत्म हो जाती है। ये तो अन्तहीन कहानी है जिसकी शुरुआत ही त्याग से होती है और त्याग पर ही खत्म हो जाती है। लेकिन उसके त्याग की महत्ता को कौन कितना समझ पता है, कितनी अहमियत देता है इस बात पर निर्भर करता है कि वो अपने जीवन में पारिवारिक या सामाजिक रूप में कितनी सफल हो पाई है।

       नारी एक ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी है जो परिवार और समाज दोनों को जोड़ती है। वही हर रिश्ते को बनाती है और वही तोड़ती है। इसके विविध रूप है और हर रूप की अपनी-अपनी विशेषता। आज से नहीं युगों से नारी शक्ति बन इस समाज में अपनी योगदान देकर हर क्षेत्र में अपनी महत्ता को दर्शया है, फिर भी नारी कमजोर की ही श्रेणी में आ जाती है क्यों ? क्यूँ नारी अपनी शक्ति को समझ नहीं पाती है, जबकि हर रूप में वो ही होती है हर किसी को बढ़ाने वाली। एक स्त्री या पुरुष अगर अपने जीवन में पारिवारिक, समाजिक और व्यवसायिक रूप में सफल होती है तो उसके पीछे भी एक नारी ही होती है, कभी माँ के रूप में, बहन के रूप में, सास के रूप में, बेटी के रूप में, तो कभी पत्नी के रूप में। सच्चाई तो यही है कि एक नारी ही नारी को और पुरुष को भी सफल बनाती है। जब एक बेटा या बेटी सफल होती है तो उसके पीछे उसकी माँ होती है, उसके संस्कारों के रूप में, उसके व्यवहारों के रूप में और उसके शक्ति के रूप में। जो माँ अपनी हर इच्छाओं का त्याग कर सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चे के भविष्य को बनाने के लिए, जीवन की हर मुश्किलों का सामना करती है, उसे हर खुशी देने की कोशिश करती है। शारीरिक, मानसिक हर प्रताड़ना को सहती है, चाहे वो पति के द्वारा दिया गया हो या परिवार और समाज के किसी भी सदस्य के द्वारा दिया गया हो। वो अपने बेटे से, उसी बेटे के लिए अपने पति से बार-बार अपमानित होती है। पति की गलतियों को भी चुपचाप सहती है। उसके द्वारा अपमानित होकर भी सहती है कि पुरुष अहम् को ठेस न लग जाए। वो पुरुष हैं न, घर का प्रधान, घर का मुखिया वो जो चाहे कह सकता है, वो जो चाहे कर सकता है। पर, ये अधिकार भी तो नारी ने ही उसे दिया है। और दूसरी तरफ वो बेटा , उसी पुरुष का अंश। फिर भी सहती है, हर दर्द हर पीड़ा को। जिस बेटे को नौ महीने अपने गर्भ में रखकर अपने खून से सींचती है, उसे ही अपने कुकर्मों द्वारा खुद के हृदय को छलनी होता हुआ अपनी ही आँखों से देखती है पर कुछ कहती नहीं सब झेलती है क्यूँ ? क्यूँ उसकी ममता उसकी शक्ति पर इतनी हावी हो जाती है कि वो ममता की पट्टी बांधे भावनाओं में बहती चली जाती है और अपने ही बेटे को गलत करते हुए देखती रह जाती है। खामोश बूत की भांति उसके दिए जख्मों को सहते-सहते हमेशा के लिए खामोश हो जाती है। जो माँ अपने बच्चे को सफल बनाने के लिए इतनी त्याग और तपस्या करती है, वहीं उसे बिगाड़ने का भी श्रेय उसी को दिया जाता है। सिर्फ इसलिए उसकी शक्ति पर उसकी भावनाएं अपना अधिपत्य जमा लेती है, और वो गलतियाँ पर गलतियाँ करती जाती है। कभी बहू को प्रताड़ित करने वाली सास के रूप में तो कभी सास को प्रताड़ित करने वाली बहू के रूप में।

       नारी जो एक शक्ति है, सम्मान की हकदार है धीरे-धीरे अपने ही हाथों अपनी छवि को धूमिल करती चली जाती है। मैंने अपने जीवन में अनुभव यही किया है कि अगर नारी अपनी शक्ति को पहचानकर, अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर, सही दिशा में अपनी शक्ति, सोच और समझ को लगाये तो हर बच्चा चन्द्रगुप्त, अशोक जैसा महान शक्तिशाली, आज्ञाकारी हो और हर बच्ची रानी लक्ष्मीबाई हो। पहले की माओं में त्याग और बलिदान की भावनाएं इतनी ज्यादा हुआ करती थी कि वो निःस्वार्थ भाव से परिवार व देश की सेवा में, मातृभूमि की रक्षा के खातिर खुद की जान की परवाह नहीं करती थी और अपने बच्चे को भी बलिदान के लिए तैयार कर लेती थी। आज हर माँ को अपनी उसी सोच और एहसास को बनाये रखने की जरुरत है ताकि हर बच्चे का भविष्य सफल एवं उज्जवल हो सके और हर नारी अपने अस्तित्व की पहचान बनाए रख सके।।